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मंगलेश डबराल - संगतकार

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क्षितिज भाग २

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संगतकार के माध्यम से कवि किस प्रकार के व्यक्तियों की ओर संकेत करना चाह रहा है?


संगतकार के माध्यम से कवि विवश या ज्ञान के इच्छुक व्यक्तियों की ओर संकेत करना चाह रहा है। वह या तो मुख्य गायक का छोटा भाई है या संगीत की शिक्षा प्राप्त करने का इच्छुक उसका कोई शिष्य या कोई दूर से पैदल आने वाला असहाय सगा-संबंधी, जिसके लिए गायन की कला सीखना विवशता है।
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संगतकार किन-किन रूपों में मुख्य गायक-गायिकाओं की मदद करते हैं?

संगतकार मुख्य रूप से गायक-गायिकाओं के साथ सहगायक, सहगायिका के रूप में मदद करते हैं। वे तरह-तरह के वाद्‌य यंत्र बजाने में सहायक बनते हैं।
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भाव स्पष्ट कीजिए:
और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।


कभी-कभी संगतकार मुख्य गायक का साथ देने के लिए गाता है। वह अस्पष्ट रूप से उसे यह बताना चाहता है कि जो राग पहले गाया जा चुका है उसे फिर से गाया जा सकता है पर उसकी आवाज में एक हिचक साफ सुनाई देती है। वह अपने स्वर को ऊँचा उठाने की कोशिश नहीं करता। इसे उसकी विफलता नहीं समझना चाहिए बल्कि उसकी मनुष्यता समझना चाहिए क्योंकि वह किसी भी अवस्था में मुख्य गायक के अहं को ठेस नहीं लगने देना चाहता। वह उसका शिष्य है। उसका बड़प्पन इसी बात मे है कि वह मुख्य गायक के मान-सम्मान की रक्षा करे। 
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संगतकार जैसे व्यक्ति संगीत के अलावा और किन-किन क्षेत्रों में दिखाई देते हैं?

संगतकार जैसे व्यक्ति संगीत के अलावा जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं। साइकिल, स्कूटर, मोटरसाइकिल, कार आदि ठीक करने वाले कारीगरों के पास काम करने वाले लड़के संगतकार की ही तरह काम सीखते और करते हैं। लुहार, काष्ठकार, मूर्तिकार, रंग-रोगन करने वाले, चर्मकार, नल ठीक करने वाले और पत्थर का काम करने वाले इसी श्रेणी से संबंधित होते हैं जो अपने-अपने गुरु या उस्ताद से अभ्यास के द्वारा काम सीख लेते हैं।
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किसी भी क्षेत्र में प्रसिद्वि पाने वाले लोगों को अनेक लोग तरह-तरह से अपना योगदान देते हैं। कोई एक उदाहरण देकर इस कथन पर अपने विचार लिखिए।

हर क्षेत्र में प्रसिद्वि पाने के लिए लोगों को अनेक लोगों की सहायता लेनी ही पड़ती है। हम सामाजिक प्राणी हैं और समाज में रहते हैं। इसलिए दूसरों की सहायता और उनके योगदान के बिना जीवन की राह में आगे नहीं बढ़ सकते। कल्पना चावला के नाम को आज हमारे देश में ही नहीं बल्कि सारे संसार में प्रसिद्वि प्राप्त हो चुकी है। उसकी प्रसिद्वि का आधार तो वह स्वयं ही है पर उसे उसके जीवन में अनेक लोगों ने योगदान दिया था। सबसे पहला योगदान तो उसके माता-पिता और भाई ने दिया। उसके हरियाणा के करनाल में स्थित स्कूल टैगोर बाल निकेतन और कॉलेज दगाल सिंह कॉलेज के शिक्षकों ने उसकी पढ़ाई में योगदान दिया। पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ ने उसकी शिक्षा में योगदान दिया। नासा ने उसे सफलता प्राप्ति के लिए भरपूर योगदान दिया न जाने कितने लोगों के योगदान को प्राप्त करके ही वह अपनी मंजिल तक थी। योगदान तो सभी को मिल जाता है पर आत्मिक बल और परिश्रम की सबसे अधिक आवश्यकता होती तभी प्रसिद्वि की प्राप्ति होती है।
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