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मंगलेश डबराल - संगतकार

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क्षितिज भाग २

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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उसकी सप्रसंग व्याख्या कीजिये:
तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढाँढ़स बँधाता
कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर
कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि बह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।

प्रसंग - प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्‌य-पुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित कविता ‘संगतकार’ से अवतरित किया गया है जिसके रचयिता श्री मंगलेश डबराल हैं। कवि ने संगतकार के महत्त्व को प्रस्तुत किया है और माना है कि वह मुख्य गायक के गायन में सहायता ही नहीं देता बल्कि अपनी इंसानियत को भी प्रकट करता है।

व्याख्या- कवि कहता है कि मुख्य गायक ऊँचे स्वर में गाता है और उसकी आवाज मध्य सप्तक से ऊपर उठकर तार सप्तक पर पहुँचती है तो ध्वनि की उच्चता के कारण उसका गला बैठने लगता है। उसकी प्रेरणा उसका साथ छोड़ने लगती है और उसका उत्साह मंद पड़ने लगता है। उसका स्वर बुझने-सा लगता है और उसे प्रतीत होने लगता है कि वह गायन ठीक प्रकार से नहीं कर पाएगा। वह हतोत्साहित-सा हो जाता है। उसमें जब निराशा का भाव भरने लगने लगता है तब संगतकार उसे सांत्वना देता है, उसका हौसला बढ़ाता है। इससे मुख्य गायक का स्वर स्वयं ही कहीं से आ जाता है। वह फिर से उद्य स्वर में गाने लगता है। उसकी निराशा समाप्त हो जाती है। कभी-कभी संगतकार वैसे ही मुख्य गायक का साथ दे देता है। वह मुख्य गायक को यह अहसास कराना चाहता है कि वह अकेला नहीं है। वह उसका साथ देने के लिए उसके साथ है। वह उसे गाकर यह भी बता देता है कि जिस राग को पहले गाया जा चुका है उसे फिर से गाया जा सकता है। पर उसकी आवाज में हिचक का भाव अवश्य छिपा रहता है। उसे यह अवश्य लगता है कि उस मुख्य गायक से संकेत मिले बिना नहीं गाना चाहिए था। ऐसा भी हो सकता है कि वह अपने स्वर को मुख्य गायक के स्वर से ऊँचा उठाने की कोशिश नहीं करना चाहता था। संगतकार के द्वारा अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश उसकी असफलता नहीं मानी जानी चाहिए, बल्कि इसे तो उसकी इंसानियत समझना चाहिए। वह मनुष्यता के भावों को सामने रखकर और सोच विचार कर अपने संगीत-गुरु की आवाज से अपनी आवाज को ऊंचा नहीं उठाना चाहता। उसमें श्रद्‌धा का भाव है, जो सराहनीय है।

 
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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिये ! 
मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज़ में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था 
 अवतरण में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।


मुख्य गायक गाता है और अपनी कला का प्रदर्शन करता है पर संगतकार उसकी आवाज में केवल अपनी आवाज ही नहीं मिलाता बल्कि वह उसके स्वर और दिशा को संभालता भी है। उसे स्वरों से दूर भटकने से रोकता भी हे।
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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिये ! 
मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज़ में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था 
मुख्य गायक के साथ स्वर कौन साधता है?

मुख्य गायक के साथ संगतकार स्वर साधता है।
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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उसकी सप्रसंग व्याख्या कीजिये:
मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज़ में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था
 

  

प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्‌य-पुस्तक क्षितिज भाग-2 में संकलित कविता ‘संगतकार’ से ली गई हैं जिसके रचयिता श्री मंगलेश डबराल हैं। कवि ने मुख्य गायक के साथ गाने वाले संगतकार की विशिष्टता का वर्णन करते हुए उसके महत्त्व को प्रतिपादित किया है।

व्याख्या- कवि कहता है कि मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी-भरकम गाने के स्वर के साथ संगतकार की काँपती हुई-सी सुंदर और कमजोर आवाज मिल गई थी। शायद वह संगतकार गायक का छोटा भाई है या उसका कोई चेला है। हो सकता है कि वह कहीं दूर से पैदल चल कर संगीत की शिक्षा प्राप्त करने वाला गायक का अभावग्रस्त रिश्तेदार ही हो। वह संगतकार मुख्य गायक की ऊंची गंभीर आवाज में अपनी गूंज युगों से ही मिलाता आया है। अभावग्रस्त, जरूरतमंद और कमजोर सदा से ही निपुण और संपन्न की ऊँची आवाज में अपनी आवाज मिलाता ही आया है। मुख्य गायक जब स्वर को लंबा खींच कर अंतरे की जटिल तानों के जंगल में खो जाता है; संगीत के रस में डूब जाता है या संगीत के सुरों की अपनी सरगम की सीमा को पार कर ईश्वरीय आनंद की प्राप्ति में डूब जाता है और उसे अनहद का आनंददायक स्वर आलौकिक आनंद देने लगता है तब संगतकार ही गीत के स्थायी को संभाल कर अपने साथ रखता है। गीत को बिखरने से वही रोकता है। ऐसा लगता है जैसे वही मुख्य गायक के पीछे छूट गए सामान को इकट्‌ठा करता है। संगतकार ही उस मुख्य गायक को उसका बचपन याद दिलाता है, जब उसने संगीत को अभी नया-नया ही सीखना आरंभ किया था और उसने संगीत में निपुणता प्राप्त नहीं की थी।

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भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संगतकार का महत्त्व प्रतिपादित कीजिए।


भारतीय इतिहास में संगतकार का सदा से ही विशिष्ट योगदान रहा है। राजा- महाराजाओं के युग में सैनिकों की सहायता से युद्ध लड़े जाते थे। हार या जीत से कोई गुलाम बन जाता था तो कोई सम्राट् बन जाता था। सैनिकों को इतिहास में कोई जानता तक नहीं पर राजसत्ता में परिवर्तन का आधार तो वही बनते थे। कर वसूल करने वाले का नाम-पता तक ज्ञात होता पर शासक और उच्चाधिकारियों के नाम को ऊंचा उठा दिया जाता है या नीचे गिरा दिया जाता है। राजतंत्र का मुखिया स्वयं तो बहुत कम काम करते थे, काम तो उनके संगतकार ही करते थे पर नाम शासक का ही होता था।
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