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अवतार सिंह पाश

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CBSE Gujarat Board Haryana Board

Previous Year Papers

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Class 10 Class 12

सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे खतरनाक वह घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी निगाह में रुकी होती है


प्रसंग: प्रस्तुत काव्याशं पाश द्वारा रचित कविता ‘सबसे खतरनाक’ से अवतरित है। कवि कई बातों को बुरा बताकर भी उन्हें सबसे खतरनाक नहीं मानता। अब वह उन बातों को बताता है जो सबसे अधिक खतरनाक हैं।

व्याख्या-कवि का कहना है कि सबसे खतरनाक यह बात होती है कि व्यक्ति में मुर्दे जैसी शांति का भर जाना। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की विरोध शक्ति समाप्त हो जाती है। इस दशा में व्यक्ति निष्क्रिय और निर्जीव हो जाता है। उसकी तड़पन समाप्त हो जाती है और वह सब कुछ सहन करता चला जाता है। प्रतिकूलताओं से जूझने की उसकी शक्ति समाप्त हो जाती है। जब व्यक्ति एक बँध बंधाए रूटीन के जीवन में जीने लगता है अर्थात् घर से निकलकर काम पर जाना और काम से लौटकर घर आ जाना तब यह स्थिति भी सबसे खतरनाक होती है। इसमें व्यक्ति की स्थिति को बदलने की क्षमता चुक जाती है। तब हम कोई सपने नहीं देखते, हमारे सपने मर जाते हैं अर्थात् ऊँचा उठने, आगे बढ़ने की कल्पना दम तोड़ देती है। यह स्थिति भी बहुत खतरनाक है।

समय की गति का रुक जाना भी बहुत खतरनाक होता है। इस दशा में कलाई की घड़ी की सुइयाँ तो चलती हैं, पर हमारी निगाह रुक जाती है। हम दूर तक देखने की क्षमता खो बैठते हैं। ऐसी स्थिति में आगे बढ़ने की लालसा ही मर जाती है। जीवन एक बँध ढर्रे पर चलने लगता है। यह स्थिति अत्यंत खतरनाक है।

विशेष-कवि अन्य खतरों से बड़ा उस खतरे को मानता है जिसमें व्यक्ति अपनी प्रतिरोधक क्षमता को खोकर सभी स्थितियों को स्वीकार करने लगता है। तब उसका विकास रुक जाता है।

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मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना-बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना-बुरा तो है
पर सबसे खतरनाक नहीं होता
कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना-बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ना-बुरा तो है
मुट्ठियाँ भींचकर बस वक्त निकाल लेना-बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता


प्रसंग: प्रस्तुत काव्याशं पंजाबी कवि पाश द्वारा रचित ‘सबसे खतरनाक’ से अवतरित है। यह कविता मूल-रूप से पंजाबी में रची गई है। इसका हिन्दी में अनुवाद चमनलाल ने किया है। इस कविता में कवि ने दिनो-दिन अधिकाधिक नृशंस और क्रूर होती जा रही स्थितियों को उसकी विद्रूपताओं के साथ चित्रित किया है। कवि तटस्थ रहने के प्रति अपनी असहमति जताता है।

व्याख्या-कवि व्यंग्यात्मक ढंग से पुलिस की कार्य-प्रणाली का उल्लेख करते हुए कहता है कि पुलिस की मार खतरनाक तो होती है, पर सबसे अधिक खतरनाक नहीं होती। मेहनत की कमाई का लुट जाना भी इसी श्रेणी में आता है। किसी के साथ गद्दारी करना अथवा लोभवश मुट्ठी गरम करना भी खतरनाक है, पर उतना खतरनाक नहीं जितना अन्य बातें।

इसी प्रकार बिना किसी कारण के पुलिस पकड़ ले जाए तो यह बुरी बात अवश्य है। जब हम सहमकर चुप हो जाते हैं और प्रतिरोध नहीं करते, तब भी बुरा होता है, पर यह स्थिति भी सबसे ज्यादा खतरनाक नहीं होती।

कई अन्य बातें भी बुरी हैं, जैसे- धोखे के शोर-शराबे में सच का गला घोंट देना और चुप रह जाना बुरा है। जुगनू के प्रकाश में पढ़ना भी बुरा है। इसी प्रकार विवशता प्रकट करते हुए अपनी मुट्ठियां भींचकर रह जाना और वक्त को निकालते जाना भी बुरी बात है। यद्यपि ये सब बातें बुरी हैं, पर सबसे अधिक खतरनाक नहीं है। और कई बातें ऐसी हैं जो बहुत ज्यादा खतरनाक हैं। उनसे बचा जाना चाहिए।

विशेष- 1. ‘बैठे बिठाए’ में अनुप्रास अलंकार है।

2. सरल एवं सुबोध भाषा का प्रयोग है।

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सबसे खतरनाक वह गीत होता है
आपके कानों तक पहुँचने के लिए
जो मरसिए पड़ता है
आतंकित लोगों के दरवाजों पर
जो गुंडे की तरह अकड़ता है
सबसे खतरनाक वह रात होती है
जो जिंदा रूह के आसमानों पर ढलती है
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते और हुआँ हुआँ करते गीदड़
हमेशा के अँधेरे बंद दरवाजों-चौगाठों पर चिपक जाते हैं


प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ पाश द्वारा रचित कविता ‘सबसे खतरनाक’ से अवतरित हैं। इसमें कवि सबसे खतरनाक स्थिति की और संकेत करता है।

व्याख्या-कवि उस गीत को सबसे खतरनाक बताता है जो हमारे कानों तक पहुँचने के लिए शोक—गीत का रूप ले लेता है। जिन लोगों को नृशंसता और क्रूरता के बलबूते पर आतंकित किया जाता है, वहाँ यह गीत अकड़ दिखाता है। कहीं मरसिए पढ़ना और कहीं अकड़ना। यह दोहरापन खतरनाक स्थिति की ओर संकेत है।

इसी प्रकार कवि उस रात को सबसे खतरनाक बताता है जहाँ उल्लू बोलते हैं और गीदड़ हुआँ-हुआँ करते हैं। यह सुनसान और भयावह वातावरण की ओर संकेत है। दरवाजों और चौखटों पर अंधकार अर्थात् त्रासद स्थिति चिपककर रह जाती है।

विशेष- 1. ‘मरसिए’, ‘जिंदा रूह’, ‘खतरनाक’ जैसे उर्दू शब्दों का प्रयोग किया गया है।

2. भाषा में प्रतीकात्मकता का समावेश है।

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कवि पाश के जीवन एवं साहित्य का परिचय देते हुए उनकी प्रमुख रचनाओं का नाम लिखिए।


कवि पाश का मूल नाम अवतारसिंह संधू है। उनका जन्म 1950 में तलवंडी के सलेम गाँव (जिला जालंधर-पंजाब) में हुआ था। मृत्यु 1988 ई. में हुई। पाश समकालीन पंजाबी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि जाने जाते हैं। मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्मे पाश की शिक्षा अनियमित ढंग से स्नातक तक हुई। 1967 में पाश बंगाल के नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े और विद्रोही कविता का नया सौंदर्य-विधान विकसित कर उसे तीखा किंतु सृजनात्मक तेवर दिया। पाश की कविताएं विचार और भाव के सुंदर संयोजन से बनी गहरी राजनीतिक कविताएँ हैं, जिनमें लोक-संस्कृति और परंपरा का गहरा बोध मिलता है। पाश जनसामान्य की घटनाओं पर आउटसाइडर की तरह प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते बल्कि इनकी कविताओं में वह व्यथा, निराशा और गुस्सा नजर आता है जो गहरी संपृक्तता के बिना संभव नहीं है।

पाश ने जनचेतना फैलाने के लिए अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया और सिआड़, हेमज्योति, हाँक, एंटी-47 आदि पत्रिकाओं का संपादन किया। कुछ समय तक अमेरिका में रहे। परिवर्तनकारी आदोलनों में सक्रिय होने के कारण इन्हें जेल भी जाना पड़ा। पाश कविता का उपयोग हथियार की तरह करते हैं। यही कारण है कि यह योद्धा कवि अलगाववादी ताकतों के खिलाफ लड़ते हुए ही शहीद हो गया। यहाँ ली गई कविता सबसे खतरनाक का मूल पंजाबी से अनुवाद चमन लाल ने किया है।

प्रमुख रचनाएँ: लौह कथा, उड़दें, बाजा मगर, साडै समिया बिच, लड़ेंगे साथी।

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सबसे खतरनाक वह आँख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है
जिसकी नजर दुनिया को मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीजों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है
जो रोजमर्रा के कम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलट-फेर में खो जाती है।
सबसे खतरनाक वह चाँद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए रंगनों में चढ़ता है
पर आपकी आँखों को मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है


प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ पाश द्वारा रचित पंजाबी कविता ‘सबसे खतरनाक’ के हिन्दी अनुवाद से अवतरित हैं। कवि उस स्थिति पर विचार करता है जो सबसे खतरनाक हो सकती है।

व्याख्या-कवि की दृष्टि में जिस आँख में कोई सपना नहीं होता और सबकुछ देखकर भी अनजान बनी रहती है, वह किसी भी स्थिति को देखकर तटस्थ बनी रहती है। उसकी प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो गई जान पड़ती है। जब लोग दुनिया को प्रेम- भाव से चूमना भूल जाते हैं। उन पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात् वे लोग संवेदनहीन हो जाते हैं। ऐसे लोग एक बने बनाए ढर्रे पर जीवन गुजारते रहते हैं। उनका जीवन लक्ष्यहीन हो जाता है। वे एक ही जिंदगी को रोज-रोज दुहराते हैं। उनमें कोई नवीनता दिखाई नहीं देती। यह स्थिति सबसे अधिक खतरनाक होती है।

कवि उस चाँद को भी सबसे खतरनाक बताता है जो प्रत्येक हत्याकांड के बाद वीरानी में भी गिन की ऊँचाई पर चढ़ता है। ऐसा चाँद आपकी आँखों में चुभना चाहिए, पर नहीं चुभता।

कवि का भाव यह है कि यह दुनिया दिनोंदिन क्रूर और नृशंस होती जा रही है और इसका विरोध करने की शक्ति हमारी क्षीण होती चली जा रही है। हम तटस्थता का भाव ओढ़े हुए हैं। यही स्थिति सबसे अधिक खतरनाक है। हमें अन्याय के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए।

विशेष- 1. प्रतीकात्मकता एवं लाक्षणिकता का समावेश हुआ है। खि का जमी बर्फ होना, लक्ष्यहीन दुहराव, चांद का वीरान आँगनों में चढ़ना आदि)

2. सरल एवं सुबोध भाषा का प्रयोग किया गया है।

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