तातुश ने बेबी से किस बात पर अपनी अप्रसन्नता प्रकट की?


दो-एक दिन बाद. बेबी सवेरे काम कर रही थी तो तातुश ने बुलाकर कहा, “बेबी, तुमने क्या घर बदल लिया है?” बेबी ने हाँ कहा तो वह बोले, “तुमने घर बदला और मुझे बताया तक नहीं!” उसे चुप देख उन्होंने कहा, “यह तुमने ठीक नहीं किया, बेबी!” मैंने सोचा, सचमुच ही मुझसे भूल हुई, एक बार बताना तो चाहिए ही था। मेरे न बताने से उन्हें दुख हुआ, यह तो मालूम पड़ गया लेकिन यह समझ में नहीं आया कि उन्हें पता कैसे चला। स्वयं उन्होंने यह कहकर बात साफ कर दी कि सुनील ने उन्हें बताया था। बेबी अभी सोच ही रही थी कि सुनील को कहाँ से पता चला होगा कि तातुश ने फिर कहा, “सुनील तुमसे मिलने तुम्हारे पुराने घर गया था। वहाँ तुम्हें न देख उसने आस-पास के लोगों से पूछा तो पता चला कि तुम कहीं और चली गई हो।” तातुश ने आगे बताया कि सवेरे वह दूध लेने गए थे तो वहाँ सुनील मिला था। उन्हें देखकर सुनील ने पूछा था, बेबी क्या अब आपके यहाँ काम नहीं करती? तातुश के पूछने पर कि वह ऐसा क्यों सोच रहा है, सुनील ने कहा था, बेबी अब वहाँ नहीं रहती जहाँ पहले रहती थी इसलिए मैंने सोचा कि वह शायद अब आपके पास नहीं है। तातुश मुझसे बोले, सुनील नहीं बताता तो मुझे कुछ पता ही नहीं चलता! मुझे सुनकर बहुत बुरा लगा।

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बेबी जब सुनील के बताए पते पर काम ढुँढ्ने गई तब उसने वहाँ क्या देखा?


अगले दिन बेबी काम पर आई तो दूर से ही पैंतीस-चालीस वर्ष की एक विधवा को उसी घर में काम के लिए जाते देखा। साहब बाहर पेड़ों में पानी दे रहे थे। बेबी को देखते ही वह भीतर गए और उस औरत से साफ-साफ बातें कर उसी समय उसे काम से हटा दिया। वह औरत भी बंगाली थी। बाहर आते ही उसने बेबी को गालियाँ देना शुरू कर दिया। बेबी ने कहा, देखो, मैं कुछ नहीं जानती। यदि जानती होती कि यहाँ पहले से ही कोई काम कर रहा है तो यहाँ नहीं आती। उससे कहने से कोई लाभ नहीं। तुम साहब को मेरी तरफ से जाकर बता दो कि वह इस तरह काम करने को राजी नहीं है। उसने ऐसा कुछ नहीं किया और उसे बकते-बकते चली गई। साहब आकर बेबी को भीतर ले गये और सब समझा-बुझा दिया कि क्या करना होगा, क्या नहीं करना होगा। बस उस दिन से वह अपने मन से खाना-वाना बनाकर, टेबिल पर रखकर घर जाने लगी। उसका काम देखकर घर में सभी आश्चर्य करते। एक दिन साहब ने पूछा, तुम इतना ढेर सारा काम इतने कम समय में और इतनी अच्छी तरह कैसे कर लेती हो? कहाँ सीखा तुमने यह सब? बेबी ने कहा, घर के काम में मुझे असुविधा नहीं होती क्योंकि बचपन से अभ्यास है। बचपन से ही बिना माँ के रही हूँ। उसके बाबा भी सब समय घर पर नहीं होते थे। इसी कारण उसका पढ़ना-लिखना भी नहीं हो सका।

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बाथरूम की समस्या को लेकर बेबी क्यों परेशान रहती थी? उसका समाधान कैसे हुआ?


बेबी को जो घर रहने को किराए पर मिला था वहाँ बाथरूम की असुविधा थी। चार घरों के बीच बाथरूम एक ही था। सवेरे कोई पेशाब के लिए उसमें घुसता तो दूसरा उसमें घुसने के लिए बाहर खड़ा रहता। टट्टी के लिए बाहर जाना पड़ता था लेकिन वहाँ भी चैन से कोई टट्टी नहीं कर सकता था क्योंकि सुअर पीछे से आकर तंग करना शुरू कर देते। लड़के-लड़कियाँ, बड़े-बूढ़े, सभी हाथ में पानी की बोतल ले टट्टी के लिए बाहर जाते। अब वे वहां बोतल सँभाले या सुअर भगाएं! बेबी को यह देख-सुनकर बहुत खराब लगता। लड़कियों को हाथ में बोतल लिए जाते उसने इसके पहले कभी नहीं देखा था। तातुश ने उससे पहले ही पूछा था, तुम जहाँ रहती हो वहाँ कोई बाथरूम-वाथरूम है कि नहीं? ऊपर एक बाथरूम है, तुम चाहो तो वहीं से नहा- धो निपटकर जा सकती हो। उस दिन से वह वहीं वह सब करने के बाद घर जाती। इस प्रकार उसकी बाथरूम की समस्या का समाधान हो गया।

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एक दिन हठात् तातुश ने बेबी के बारे में क्या पूछा?


कुछ दिनों बाद एक दिन हठात् तातुश ने पूछा, “अच्छा बेबी यह तो बताओ कि यहाँ से जाकर तुम क्या करती हो?” मैंने कहा “मैं जाते ही खाना बनाने में लग जाती हूँ और साथ ही साथ बच्चों को नहलाती- धुलाती हूँ। फिर उन्हें खिला-पिलाकर सुला देती हूँ। तीसरे पहर उनके साथ थोड़ा घूमती-थामती हूँ और शाम को संध्या-पूजाकर उन्हें पढ़ने बिठा देती हूँ। रात में फिर उन्हें खिलाना-पिलाना और सुलाना और सवेरे जल्दी से जल्दी यहाँ के लिए निकल पड़ना। बस यही है मेरे सारे दिन का काम।” फिर वह बोले, “अच्छा, फिर जो तुम, और काम ढुँढ़ रही हो तो उसके लिए तुम्हें समय कहाँ से मिलेगा?” बेबी बोली, “इसी में से निकालना होगा, और नहीं तो क्या! बिना किए और कोई चारा भी तो नहीं!” इस पर उन्होंने कहा, “देखो, यदि मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ तब तो तुम कहीं और काम नहीं करोगी न?” उनकी बात सुन बेबी सोचने लगी ‘वह मेरा कितना खयाल रखते हैं, कितना मुझे चाहते हैं!’ उन्होंने फिर पूछा ‘क्यों क्या हुआ? तुमने कुछ बताया नहीं! क्या, सोच रही हो?’ बेबी ‘बस, कुछ भी तो नहीं,’ कहकर चुप हो गई। उन्होंने कहा, “देखो बेबी, तुम समझो कि मैं तुम्हारा बाप, भाई, माँ, बंधु, सब कुछ हूँ। यह कभी मत सोचना कि यहाँ तुम्हारा कोई नहीं है। तुम अपनी सारी बातें मुझे साफ-साफ बता सकती हो, मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगेगा। मेरे बच्चे मुझे तातुश कहते हैं, तुम भी मुझे वही कहकर बुला सकती हो।” उस दिन से बेबी उन्हें तातुश कहने लगी।

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बेबी की दिनचर्या कैसे चलने लगी?


बेबी इसी तरह रोज सवेरे आती और दोपहर तक सारा काम खत्म कर चली जाती। बीच-बीच में साहब उसके बारे में इधर-उधर की बातें पूछ लेते। एक दिन उन्होंने उसके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा तो बेबी ने कहा वह तो पढ़ाना चाहती है लेकिन वैसा सुयोग कहाँ है, फिर भी चेष्टा तो करेगी। तातुश ने एक दिन बुलाकर फिर कहा, “तुम अपने लड़के और लड़की को लेकर आना। यहाँ एक छोटा सा स्कूल है। मैं वहाँ बोल दूँगा। तुम रोज बच्चों को वहाँ छोड़ देना और घर जाते समय अपने साथ ले जाना।” बेबी अब बच्चों को साथ लेकर आने लगी। उन्हें स्कूल में छोड़, घर आकर अपने काम में लग जाती। स्कूल से बच्चे जब उसके पास आते तो साहब कुछ न कुछ उन्हें खाने को देते। अब वह सोचने लगी कि मुझे कहीं और भी काम करना चाहिए क्योंकि इतने पैसों में क्या बच्चों को पालेगी-पोसेगी और क्या घर का किराया देगी? उसने साहब से कहा कि यदि उन्हें पता चले कि किसी को काम करने वाले की जरूरत है तो उसे बताएँ। उन्होंने कहा कि आस-पास पता कर वह उसे बताएँगे लेकिन उसे अब कहीं काम ढुँढ़ने नहीं जाना है। फिर भी उसे अपना यह घर तो छोड़ना ही होगा यह सोचकर वह अपने दादा लोगों के आस-पास ही घर ढुँढ़ने जाने लगी।

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