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शमशेर बहादुर सिंह

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Aroh Bhag II

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अपने परिवेश के उपमानों का प्रयोग करते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त का शब्दचित्र खींचिए।


सूर्योदय

लो पूर्व दिशा में उग आया

सूरज

लाल-लाल गोले के समान

चारों ओर लालिमा फैलती चली गई

और सभी प्राणी जड़ से चेतन

बन गए।

सूर्यास्त

सूरज हुक्के की चिलम जैसा लगता है,

इसे किसान खींच रहा है

पशुओं के झुंड चले आ रहे हैं

और पक्षियों की वापिसी की उड़ान

तेज हो चली है

धीरे-धीरे सब कुछ अदृश्य

हो चला है

और

सूरज पहाड़ की ओट दुबक गया।

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सूर्योदय का वर्णन लगभग सभी बड़े कवियों ने किया है। प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ और अज्ञेय की ‘बावरा अहेरी’ की पंक्तियाँ आगे बॉक्स में दी जा रही हैं। ‘उषा’ कविता के समानांतर इन कविताओं को पढ़ते हुए नीचे दिए गए बिंदुओं पर तीनों कविताओं का विश्लेषण कीजिए और यह भी बताइए कि कौन-सी कविता आपको ज्यादा अच्छी लगी और क्यों?

● उपमान ● शब्दचयन ● परिवेश


बीती विभावरी जाग री!

अंबर पनघट में डुबो रही-

तारा-घट ऊषा नागरी।

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,

किसलय का अंचल डोल रहा,

लो यह लतिका भी भर लाई-

मधु मुकुल नवल रस गागरी।

अधरों में राग अमंद पिए,

अलकों में मलयज बंद किए-

तू अब तक सोई है आली

अस्त्रों में भरे विहाग री।

- जयशंकर प्रसाद

भोर का बावरा अहेरी

पहले बिछाता है आलोक की

लाल-लाल कनियाँ

पर जब खींचता है जाल को

बाँध लेता है सभी को साथ:

छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े पंखी

डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल

उड़ने जहाज,

कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले

तारघर की कटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी

बेपनाह काया को:

गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी

पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रेखा को

और दूर कचरा जलाने वाली कल की उद्दंड चिमनियों को जो धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी।

-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

उत्तर: इन तीनों कविताओं में हमें जयशंकर प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ सबसे ज्यादा अच्छी लगी। इसके कारण ये हैं-
इस कविता में प्रात:कालीन वातावरण साकार हो उठा है। यह ‘उषा’ और ‘बावरा अहेरी’ कविताओं से ज्यादा स्पष्ट है।

मानवीकरण ‘उषा’ कविता में भी है और ‘बीती विभावरी’ में भी है। यह ‘बावरा अहेरी’ में भी है। पर ‘बीती विभावरी’ कविता में प्रकृति का मानवीकरण अधिक प्रभावी बन पड़ा है। इस पूरी कविता में मानवीकरण है।

शब्द-चयन की दृष्टि से भी ‘बीती विभावरी’ कविता श्रेष्ठ है। इस कविता के शब्द बोलते जान पड़ते हैं-

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा

अधरों में राग अमंद पिए।

आँखों में भरे विहाग री।

इस कविता में तत्सम शब्दावली का प्रयोग देखते ही बलता है।

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भोर का नभ

राख से लीपा हुआ चौका

(अभी गीला पड़ा है)

नई कविता में कोष्ठक, विराम-चिन्हऔर पंक्तियों के बीच का स्थान भी कविता को अर्थ देता है। उपर्युक्त पंक्तियों में कोष्ठक से कविता में क्या विशेष अर्थ पैदा हुआ है? समझाइए।


कोष्ठक में दिया गया है-’अभी गीला पड़ा है’ कवि भोर के नभ में राख से लीपे हुए चौके की संभावना व्यक्त करता है। आसमान राख के रंग जैसा है। यह चौका प्रात:कालीन ओस के कारण गीला पड़ा हुआ है। अभी वातावरण में नमी बनी हुई है। इसमें पवित्रता की झलक प्रतीत होती है। कोष्ठक में लिखने से चौका का स्पष्टीकरण हुआ है।

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कविता के किन उपमानों को देखकर यह कहा जा सकता है कि उषा, कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र है?


कविता के निम्नलिखित उपमानों को देखकर यह कहा जा सकता है कि ‘उषा’ कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्द-चित्र है-

राख से लीपा हुआ चौका।

बहुत काली सिल।

स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मलना।

किसी की गौर झिलमिल देह का हिलना।

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