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हरिवंशराय बच्चन

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Aroh Bhag II

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Class 10 Class 12

प्रस्तुत पक्तियों का सप्रसंग व्याख्या करें?

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,

मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;

क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,

मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,

मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;

जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,

मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!


प्रसंग प्रस्तुत काव्याशं आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ द्वारा रचित कविता ‘आत्म–परिचय’ से अवतरित है। कवि अपने व्यक्तित्व की विशिष्टता का बखान करता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं तो रोया अत: मेरे हृदय का दु:ख शब्दों में ढलकर प्रकट हुआ और इसे ससार गाना (गीत) कहता है। कवि के हृदय के भाव सहजता के साथ फूटे तो संसार के लोग उसे छंद बनाना कहने लगे। ससार उसे कवि कहता है और अपनाने की (स्वीकार करने की) बात कहता है जबकि कवि स्वयं को इस दुनिया का एक दीवाना मात्र समझता है। वैसे कवि चाहकर भी इस दुनिया से पूरी तरह तरह कटकर नहीं रह सकता। कवि के अनुसार यह संसार बड़ा ही विचित्र है। यह किसी कै आतरिक भावो को समझ ही नहीं पाता।

कवि कहता है कि मेरा वेश ही दीवानों जैसा है। दीवानों में जैसी मादकता (मस्ती) होती है, वैसी ही उसमें भी है। मेरी मादकता ऐसी है जिसमें अन्य कुछ भी न बचा हो। मेरे मादकता भरे गीतों को सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं, झुकने लगते हैं और वे भी मस्ती में लहराने लगते हैं। कवि तो ऐसी ही मस्ती का संदेश लोगों को देता फिरता है। लोग इसी संदेश को गीत समझ लेते हैं। विशेष: 1 कवि अपनी मस्ती का बखान करता है। यही मस्ती उसके गीतों में फूट पड़ती है।

2. ‘क्यों कवि कहकर’ तथा ‘झूम झुके’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।

3. कवि का व्यक्तिवाद उभरा है।

4. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

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प्रस्तुत पक्तियों का सप्रसंग व्याख्या करें?
मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,

उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,

जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,

मैं, हाय 2 किसी की याद लिए फिरता हूँ,

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?

नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!

फिर छू न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?

मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना!


प्रसंग: प्रस्तुत पक्तियाँ आधुनिक युग के प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ द्वारा रचित कविता आत्म-परिचय ?ए अवतरित है। इसमें कवि अपनी जीवन-शैली का परिचय देता है।

व्याख्या: कवि अपने बारे में बताते हुए कहता है कि मैं तो यौवन की मस्ती में रहता हूँ। मेरे ऊपर अत्यधिक प्रेम की सनक सवार रहती है। इस मस्ती के मध्य दुःख की उदासी भी छिपी रहती है अर्थात् सुख-दुःख की मिली-जुली भावना मौजूद रहती है। मेरी यह मनःस्थिति मुझे बाहर से तो हँसते हुए अर्थात् प्रसन्नचित्त दर्शाती है, पर यह मुझे अंदर-ही-अंदर रुलाती रहती है। कवि कहता है कि उसने जवानी में किसी से प्रेम करके उसकी यादों को अपने हृदय में संजोया था। उसके अंदर-ही-अंदर रोने या व्यथित रहने का कारण यह है कि वह किसी (प्रिय) की याद को हृदय में बसाए हुए है और यह हर समय उसके साथ रहती है। उसके न मिलने पर वह दुःखी हो जाता है।

यह संसार बड़ा ही विचित्र है। इसको जानना अत्यंत कठिन है। इसको जानने के बहुत प्रयत्न किए गए, पर इसका सच किसी के समझ में नहीं आया। जहाँ पर कुछ समझदार एवं चतुर व्यक्ति होते हैं वहीं यहाँ नादान लोग टिके रहते हैं। लोगों के अपने-अपने स्वार्थ हैं। वह व्यक्ति निश्चय ही मूर्ख है जो जग की बातों में आ जाता है। मैं तो सीखे हुए ज्ञान को भुलाकर नई बातें सीख रहा हूँ। मैं तो संसार की बातें भूलकर अपने मन के मुताबिक चलना सीख रहा हूँ।

विशेष: 1. कवि अपने यौवनकाल की मनःस्थिति का विश्लेषण करता जान पड़ता है।

2. ‘उन्मादों में अवसाद’ विरोधमूलक स्थिति है।

3. व्यक्तिवादी दृष्टिकोण मुखरित हुआ है।

4. खड़ी बोली का प्रयोग है।

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दिये गये काव्याश का सप्रसंग व्याख्या करें?
मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,

फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;

कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर

मैं साँसों के वो तार लिए फिरता हूँ!

मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,

मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,

जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,

मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!


प्रसंग: प्रस्तुत काव्याशं आधुनिक युग के प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ द्वारा रचित कविता ‘आत्म-परिचय’ से अवतरित है। इसमें कवि अपने जीवन को जीने की शैली का परिचय देता है। समाज में रहकर व्यक्ति को सभी प्रकार के अनुभव होते हैं। कभी ये अनुभव मीठे होते हैं तो कभी खट्टे। इस दुनिया से कवि का सबंध प्रीति- कलह का है। कवि इस कविता में दुनिया से अपने द्विधात्मक और द्वंद्वात्मक सबंधी को उजागर करता है।

व्याख्या: कवि कहता है कि मैं इस संसारिक जीवन का भार अपने ऊपर लिए हुए फिरता रहता हूँ। इसके बावजूद मेरे अपने जीवन में प्यार का भी समावेश है। यह एक द्वंद्वात्मक स्थिति है। किसी प्रिय ने उसके हृदय की भावनाओं को स्पर्श करके उसकी हृदय रूपी वीणा के तारो को झनझना दिया अर्थात् उसके हृदय में प्रेम की लहर उत्पन्न कर दी। वह तो साँसों के केवल दो तार ही हुए जी रहा है।

कवि कहता है कि वह प्रेम रूपी मदिरा को पीकर मस्त रहता है। वह इस प्रेम रूपी मदिरा को पीकर इसकी मस्ती में डूबा रहता है। वह इस मस्ती में कभी भी संसार की बातों का ध्यान नहीं करता। संसार के लोग क्या कहते हैं, उसे इसकी परवाह नहीं है। यह संसार उनकी पूछ-ताछ करता है जो उसके कहने पर चलते हैं। इसके विपरीत कवि तो अपने मन के अनुसार गाता है अर्थात कवि संसार के बताए इशारों पर नहीं चलता वह तो अपने मन का बात सुनता है और वही करता है। वह (कवि) तो अपने लिए अपने मन के अनुसार गीत गाता रहता है।

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प्रस्तुत पक्तियों का सप्रसंग व्याख्या करें?

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,

मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता;

जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,

मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,

शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,

हों जिस पर भूपोंके प्रासाद निछावर,

मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।


प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक काल के कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ द्वारा रचित कविता ‘आत्म-परिचय’ से अवतरित हैं। इस कविता में कवि अपने पृथक् व्यक्तित्व का परिचय देता है।

व्याख्या: कवि बताता है कि मैं और हूँ तथा यह संसार और है। दोनों अलग- अलग हैं। इन दोनों मे कोई नाता (संबंध) नहीं है। मेरा तो इस संसार के साथ टकराव चलता रहता है। मैं तो इस जग (संसार) को मिटाने का प्रयास करता रहता हूँ। यह संसार तो इस धरती पर वैभव (धन-संपत्ति) जोड़ता रहता है। इस संसार के लोगों की रुचि धन-संपत्ति के सग्रह मे रहती है और एक मैं हूँ जो हर कदम पर इस धरती को अर्थात् संसार को ठुकराया करता हूँ। कवि इस जग में रहते हुए भी इस जग की प्रवृत्ति को नहीं अपनाता।

कवि अपने रोदन में भी राग लिए फिरता है। यह भी एक विरोधात्मक स्थिति है (रोदन में राग) अर्थात् कवि के रोने मे भी राग . जैसी मस्ती बनी रहती है। इसी प्रकार उसकी शीतल वाणी में भी आग समाई रहती है। (शीतल में आग विरोध मूलक स्थिति है।) वह इन विरोधाभास मूलक स्थितियों को साधते-साधते और मस्ती और दीवानगी के आलम में रहता है। इस धरती पर तो राजाओं के महल मौजूद हैं, पर कवि उस खंडहर का एक भाग अपने पास रखता है जिसे उस महल पर न्योछावर किया जा सके। अर्थात् वह इस दुनिया में है, पर इस दुनिया का तलबगार नहीं है।

विशेष: 1. कवि अपने और जग के अंतर को स्पष्ट करते हुए व्यक्तिवाद की प्रतिष्ठा करता जान पड़ता है।

2. कवि विरोधाभास अलंकार का प्रयोग अत्यंत सटीक रूप में करता है ‘रोदन मै राग’, ‘शीतल वाणी में आग’।

3. ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

4. खड़ी बोली का प्रयोग है।

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दिये गये काव्याशं सप्रसंग व्याख्या करें?


प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ द्वारा रचित कविता ‘आत्म-परिचय’ से अवतरित है। इसमें कवि अपने जीवन जीने की शैली पर प्रकाश डालता है। इस जीवन में कवि को अनेक प्रकार के अनुभव होते है। कवि अपनी विशिष्ट छवि बनाए रखता है।

व्याख्या: कवि इस संसार में अपना पृथक् व्यक्तित्व बनाए रखता है। उसके हृदय में भेंटस्वरूप देने के लिए कुछ भाव और उपहार हैं। कवि कहता है कि मैं अपने हृदय के भावों को ही महत्व देता हूँ। मैं किसी अन्य के इशारे पर नहीं चलता। मैं तो अपने हृदय की बात सुनता हूँ। वही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है। मुझे तो यह संसार अधूरा प्रतीत होता है अत: यह मुझे अच्छा नहीं लगता। मुझे तो अपने सपनों की दुनिया ही भाती है, मैं उसी में रमा रहता हूँ। (छायावादी शैली का प्रभाव)।

कवि कहता है कि मेरे हृदय में भी एक प्रक्रार की अग्नि (प्रेमाग्नि) जलती रहती है और मैं इसी मे जलता रहता हूँ। कवि प्रेम की वियोगावस्था में व्यथित रहता है। कवि सुख और दु:ख दोनों दशाओं में मग्न रहता है। यह संसार इस भवरूपी सागर से पार उतरने के लिए भले ही नाव का निर्माण करे, पर कवि तो इस भव-सागर की लहरों पर मस्ती के साथ बहता रहता है। उसे पार जाने की चाह नहीं है। वह तो इसी संसार में मस्ती भरा जीवन बिताता रहता है। कवि को इस संसार के तौर -तरीके पसंद नहीं हैं। उसकी अपनी जीवन शैली है, वह उसी प्रकार जीता है। वह संसार रूपी सागर की लहरो का मस्त होकर बहता रहता हैए।

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