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गिरिजाकुमार माथुर - छाया मत छूना

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क्षितिज भाग २

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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उसकी सप्रसंग व्याख्या कीजिये:
छाया मत छूना
मन, होगा दु :ख दूना।।
यश है या न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।
जो है यथार्थ कठिन उस का तू कर पूजन

प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्‌य-पुस्तक क्षितिज भाग-2 में संकलित कविता ‘छाया मत छूना’ से ली गई हैं जिसके रचयिता श्री गिरिजा कुमार माथुर हैं। कवि का मानना है कि जीवन में दुःख. और सुख तो आते रहते हैं, पर दु:ख की घड़ियों में सुखों को याद नहीं करना चाहिए।

व्याख्या- कवि कहता है कि हे मेरे मन, जीवन में आने वाले दु:ख के समय छाया रूपी सुख को मत छूना क्योंकि इससे दु:ख कम नहीं होता बल्कि वह दो गुना बढ़ जाता है। मेरे जीवन में न तो शान- शौकत है और न ही धन-दौलत। मेरे पास न तो मान-सम्मान है और न ही किसी प्रकार की पूंजी। श्रेष्ठता और प्रभुता की प्राप्ति की इच्छा तो केवल धोखे के पीछे भागना है। जो नहीं है उसे प्राप्त करने की इच्छा है। हर सुख के पीछे दुःख छिपा रहता है। ठीक उसी प्रकार जैसे चांदनी रात के पीछे अमावस्या की अंधेरी रात छिपी रहती है। हे मेरे मन, जो अति मुश्किल सच्चाई है; वास्तविकता है- तू उसकी पूजा कर। उसे प्राप्त करने का प्रयत्न कर।

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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उसकी सप्रसंग व्याख्या कीजिये:
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।
दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं,
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?
जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण,
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।


प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्‌य-पुस्तक क्षितिज भाग-2 में संकलित कविता ‘छाया मत छूना’ से ली गई हैं जिसके रचयिता श्री गिरिजा कुमार माथुर हैं। कवि का मानना है कि जीवन में दुःख और सुख तो आते रहते हैं, पर दुख की घड़ियों में सुखों को याद नहीं करना चाहिए।

व्याख्या- कवि कहता है कि हे मेरे मन, जीवन में आने वाले दुख के समय छाया रूपी सुख को मत छूना क्योंकि इससे दु:ख कम नहीं होता बल्कि वह दो गुना बढ़ जाता है। मेरे जीवन में न तो शान- शौकत है और न ही धन-दौलत। मेरे पास न तो मान-सम्मान है और न ही किसी प्रकार की पूंजी। श्रेष्ठता और प्रभुता की प्राप्ति की इच्छा तो केवल धोखे के पीछे भागना है। जो नहीं है उसे प्राप्त करने की इच्छा है। हर सुख के पीछे दुख छिपा रहता है। ठीक उसी प्रकार जैसे चांदनी रात के पीछे अमावस्या की अंधेरी रात छिपी रहती है। हे मेरे मन, जो अति मुश्किल सच्चाई है; वास्तविकता है- तू उसकी पूजा कर। उसे प्राप्त करने का प्रयत्न कर।

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‘छाया मत छूना’ कविता के आधार पर श्री गिरिजा कुमार माथुर की मानसिक सबलता पर टिप्पणी कीजिए।


श्री गिरिजा कुमार माथुर छायावादी काव्य धारा से प्रभावित थे और उनकी कविता में प्रेम-सौंदर्य और कल्पना की अधिकता है पर कवि ने ‘छाया मत छूना’ कविता में कल्पना की उड़ान से बहुत दूर होकर अपनी मानसिक सबलता का परिचय दिया है, कोरी कल्पनाएँ जीवन में किसी काम की नहीं होती। इनसे सुखों की अनुभूति होती है लेकिन जीवन का वास्तविक सुख प्राप्त नहीं होता। जीवन में सुख-दुःख तो दोनों आते हैं लेकिन दुःख की घड़ियों में हम सुखों को याद करके अपनी पीड़ा को बढ़ा लेते हैं। जीवन में केवल मधुर सपने नहीं हैं। इसमें कठोरता भी बसती है। हमें पुरानी बातों को भुलाकर भविष्य की ओर मजबूत कदमों से बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?
जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण।

जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने लक्ष्य की ओर अपनी दृष्टि जमाएं रखें और आगे बढ़ते जाएं न कि पिछले सुखों को याद कर-कर आसू बहाते रहें।

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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिये:
छाया मत छूना
मन, होगा दु:ख दूना।
जीबन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी:
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।
भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण
अवतरण में निहित भावार्थ को स्पष्ट कीजिए।


कवि ने सुख और दुःख को जीवन का आवश्यक हिस्सा माना है। मनुष्य को जीवन में दुःख आने की स्थिति में सुखों को याद नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे दुःख कम नहीं होते बल्कि दुगुने हो जाते हैं।
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निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर उसकी सप्रसंग व्याख्या कीजिये:
छाया मत छूना
मन, होगा दु:ख दूना।
जीबन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी:
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।
भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण

प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्‌य-पुस्तक क्षितिज भाग-2 में संकलित कविता छाया मत छूना से अवतरित किया गया है जिसके रचयिता श्री गिरिजा कुमार माथुर हैं। कवि ने पुरानी सुखद बातों को बार-बार याद करने को उचित नहीं माना क्योंकि ऐसा करने से जीवन में आए दुःख दुगुने हो जाते हैं।

व्याख्या-कवि कहता है कि हे मेरे मन, तू पुरानी सुख भरी यादों को बार-बार अपने मन में मत ला; उन्हें याद मत कर। ऐसा करने से मन में छिपा दुःख बढ़ जाएगा; वह दुगुना हो जाएगा। हम मानवों के जीवन में, न जाने कितनी सुख भरी यादें मन में छिपी रहती हैं। वे सुखद रंग-बिरंगी छवियों की झलक और उनके आस-पास मधुर यादों रूपी गंध सदा ही मन को मोहती रहती हैं। वे सदा ही अच्छी लगती हैं। जब सुखद बात बीत जाती है तब केवल शरीर की मादक-मोहक सुगंध ही यादों में शेष रह जाती है। जब तारों से भरी सुखद चाँदनी रात बीत जाती है तब यादें शेष रह जाती हैं। लंबे सुंदर फूलों में लगे फूलों की याद ही चांदनी के समान मन में छाई रहती हैं। सुख भरे समय में भूल से किया गया एक स्पर्श भी जीवित क्षण के समान सुंदर और मादक प्रतीत होता है। उसे भुलाने की बात मन मैं कभी नहीं आती। वही सुखद पल जीवन के लिए सुखदायी बन कर मन में छिपा रहता है।

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