Chapter Chosen

देव - सवैया

Book Chosen

क्षितिज भाग २

Book Store

Download books and chapters from book store.
Currently only available for.
CBSE Gujarat Board Haryana Board

Previous Year Papers

Download the PDF Question Papers Free for off line practice and view the Solutions online.
Currently only available for.
Class 10 Class 12

निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर प्रसंग सहित व्याख्या कीजिये:
डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छबि भारी दै।
पवन झूलावै, केकी-कीर बरतावैं, ‘देव’,
कोकिल हलावै-हुलसावै कर तारी दै।।
पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै।।


प्रसंग- प्रस्तुत पद हमारी पाठ्‌य-पुस्तक ‘क्षितिज’ (भाग- 2) में संकलित ‘कवित्त’ से लिया गया है। जिस के रचयिता रीतिकालीन कवि देव है। कवि ने ऋतुराज बसंत को एक बालक के रूप में प्रस्तुत किया है और प्रकृति के प्रति अपने प्रेम भाव को प्रकट किया है।

व्याख्या- कवि कहता है कि बसंत ऋतु आ गई। बसंत एक नन्हें बालक की तरह पेड़ की डाली पर नए-नए पलों के पलने रूपी बिछौने पर झूलने लगा है। फूलों का ढीला-ढाला झबला उस के शरीर पर अत्यधिक शोभा दे रहा है। अर्थात् बसंत के आते ही पेड़-पौधे नए-नए पत्तों और फूलों से सज-धज कर शोभा देने लगे हैं। हवा उसके पलने को झुलाती है। देव कवि कहता है कि मोर और तोते अपनी-अपनी आवाजों में उस से बातें करते हैं। कोयल उसके पलने को झुलाती है और तालियाँ बजा-बजा कर अपनी प्रसन्नता प्रकट करती है। कमल की कली रूपी नायिका सिर पर लता रूपी साड़ी से सिर ढांप कर अपने पराग कणों से बालक बसंत की नजर उतार रही है। अर्थात् वह बालक बसंत को दूसरों की बुरी नजर से बचाने का वैसा ही टोटका कर रही है, जैसा सामान्य नारियाँ किसी बच्चे की नजर उतारने के लिए उस के सिर के चारों ओर राई-नमक घुमाकर आग में डालने का टोटका किया करती हैं। यह बसंत कामदेव महाराज का बालक है जिसे प्रात: होते ही गुलाब चुटकियाँ बजा कर जगाते हैं। अर्थात् गुलाब की कली फूल में बदलने से पहले जब चटकती है तो बसंत को जगाने के लिए ही ऐसा करती है।

448 Views

निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर प्रसंग सहित व्याख्या कीजिये:
फटिक सिलानि सौं सुधारयौ सुधा मंदिर,
उदधि दधि को सो अधिकाइ उमगे अमंद।
बाहर ते भीतर लौं भीति न दिखैए ‘देव’,
दूध को सो फेन फेल्यो आंगन फरसबंद।
तारा सी तरुनि तामें टाढ़ी झिलमिली होति,
मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद।
आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद।।

प्रसंग- प्रस्तुत पद रीतिकालीन कवि देव के द्वारा रचित है जिस में कवि ने चांदनी रात की आभा को अति सुंदर ढंग से प्रकट किया है। कवि ने वास्तव में इसके माध्यम से राधा के रूप-सौंदर्य को प्रस्तुत करने की चेष्टा की है।

व्याख्या- अमृत की धवलता और उज्ज्वलता वाले भवन को स्फटिक की शिलाओं से इस प्रकार बनाया गया है कि उस में दही के समुंदर की तरंगों-सा अपार आनंद उमड़ रहा है। देव कवि कहते हैं कि भवन बाहर से भीतर तक चाँदनी उज्ज्वलता से इस प्रकार भरा हुआ है कि उसकी दीवारें भी दिखाई नहीं दे रही। दूध के झाग जैसी उज्ज्वलता सारे गन और फर्श के रूप में बने ऊँचे स्थान पर फैली हुई है। इस भवन में तारे की तरह झिलमिलाती युवती राधा ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे मोतियों की आभा और जूही की सुगंध हो। राधा की रूप छवि ऐसी ही है। आइने जैसे साफ-स्वच्छ आकाश में राधा का गोरा रंग ऐसे फैला हुआ है कि इसी के कारण चंद्रमा राधा का प्रतिबिंब-सा लगता है।

246 Views

पठित पदों के आधार पर देव के चाक्षुक बिंब विधान को स्पष्ट कीजिए।

देव के काव्य में सुंदर ढंग से बिंब योजनाएँ की गई हैं। इससे श्रृंगारपरक अंश तो खिल उठे हैं। चाक्षुक बिंब योजना तो ऐसी है कि श्रोता या पाइक की आँखों के सामने कवि के मन में उभरी रूप-छवि स्पष्ट उभर आती है-

(i) साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
माथे किरीट बड़े दृग चंचल, मंद हंसी मुखचंद जुंहाई।

(ii) पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।

देव के बिंब विधान में संवेदनात्मक, अलंकरण और क्रमबद्‌धता के अतिरिक्त भावात्मक संबंध स्थापित करने की शक्ति है।

171 Views

देव की कविता में शब्द भंडार पर टिप्पणी कीजिए।

देव कवि शब्दों का कुशल शिल्पी है जिसने एक-एक शब्द को बड़ी कुशलता से तराश कर अपने शब्द भंडार को समृद्ध किया है। उसकी वर्ण योजना में संगीतात्मकता और चित्रात्मकता विद्यमान है। भाव और वर्ण-विन्यास में संगति है। उसका एक-एक शब्द मोतियों की तरह कवित्त-सवैयों की जमीन पर सजाया गया है-

पाँयनि नूपुर मंजु बजैं, कीट किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।।

कवि के पास अक्षय शब्द भंडार है। भिन्न-भिन्न पर्याय और विशेषणों द्वारा देव ने भावों की विभिन्न छवियों को उतारा है। उन्होंने अभिधा, लक्षणा और व्यंजना तीनों का प्रयोग सफलतापूर्वक किया है-

आरसी से अंबर में आभा-सी उजारी लगै,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद।।

कवि के शब्दों में तत्सम की अधिकता है।  तद्‌भव शब्दावली का उन्होंने सुंदर प्रयोग किया है।

156 Views

निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर प्रसंग सहित व्याख्या कीजिये:
पाँयनि नूपुर मंजु बजैं, कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
माथे किरीट बड़े दृग चंचल, मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई
जै जग-मंदिर-दीपक सुंदर, श्रीब्रजदूलह ‘देव’ सहाई।।


प्रसंग- प्रस्तुत सवैया रीतिकालीन कवि देव के द्वारा रचित है और इसे हमारी पाठ्‌य-पुस्तक क्षितिज (भाग- 2) में संकलित किया गया है। कवि ने श्री कृष्ण, के बालरूप र्को अद्‌भुत सुंदरता का वर्णन किया है।

व्याख्या- कवि कहता है कि श्री कृष्ण के पाँव में पाजेब है जो उन के चलने पर बजने के कारण अत्यंत सुंदर ध्वनि उत्पन्न करती है। उनकी कमर में करघनी है जो मीठी धुन पैदा करती है। उनके साँवले-सलोने अंगों पर पीले रंग के वस्त्र शोभा देते हैं। उनकी छाती पर शोभा देती हुई फूलों की माला मन में प्रसन्नता उत्पन्न करती है। उनके माथे पर अट है और उन की बड़ी-बड़ी आँखें हैं जो चंचलता से भरी हैं। उनकी मंद-मंद हँसी उनके चांद जैसे सुंदर चेहरे पर चांदनी की तरह फैली हुई है। संसार रूपी इस मंदिर में दीपक के समान जगमगाते हुए अति सुंदर श्रीकृष्ण की जयजयकार हो। देव कवि कहता है कि जीवन में सदा श्रीकृष्ण सहायता करते रहें।

1909 Views