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अपू के साथ ढाई साल

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Class 10 Class 12
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किन दो दृश्यों में दर्शक यह पहचान नहीं पाते कि उनकी शुटिंग में कोई तरकीब अपनाई गई है?


पहला दृश्य-रेलगाड़ी के दृश्य में दर्शक उसमें अपनाई गई तरकीब को नहीं पहचान पाते । रेलगाड़ी के शॉट के लिए तीन रेलगाड़ियों का प्रयोग किया गया था । अनिल बाबू इंजन ड्राइवर के केबिन में चढ़कर शूटिंग स्थल तक पहुँचने पर बायलर में कोयला डलवाते थे ताकि काला धुआँ निकले । सफेद काशफूलों की पृष्ठभूमि पर काला धुआँ दर्शाना था । दर्शक यह नहीं पहचान पाता कि इस सीन के लिए तीन रेलगाड़ियों का प्रयोग किया गया है ।
दूसरा दृश्य-' आभूलो' कुत्ते का दृश्य । इस दृश्य में पहले कुत्ते (भूलो) के बीच में मर जाने पर दूसरे कुत्ते से काम लिया गया । एक ही सीन में दो अलग- अलग कुत्तों से काम लेने को दर्शक नहीं पहचान पाते । लेखक की तकरीब काम आ गई ।

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बारिश का दृश्य चित्रित करने में क्या मुश्किल आई और उसका समाधान किस प्रकार हुआ?


बारिश का दृश्य चित्रित करने में यह मुश्किल आई कि बरसात के दिनों में लेखक के पास पैसे नहीं थे, इस कारण शुटिंग बंद रखनी पड़ी । बाद में जब लेखक के पास पैसे आए तब तक अक्टूबर का महीना शुरू हो चुका था । शरद् ऋतु में बारिश होना चाँस पर निर्भर करता है । लेखक हर रोज देहात में जाकर बारिश होने की प्रतीक्षा करने लगा ।

आखिर एक दिन समस्या का समाधान हो ही गया । शरद् ऋतु में भी आसमान में बादल छा गए और धुआँधार बारिश शुरू हो गई । लेखक ने इस बारिश का पूरा फायदा उठाया और दुर्गा और अपू का बारिश में भीगने वाला दृश्य शूट कर लिया । फिल्म का यह दृश्य बहुत अच्छा चित्रित हुआ ।

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फिल्म में श्रीनिवास की क्या भूमिका थी और उनसे जुड़े बाकी दृश्यों को उनके गुजर जाने के बाद किस प्रकार फिल्माया गया?


पथेर पांचाली 'फिल्म में श्रीनिवास घूमते हुए मिठाई बेचने वाले की भूमिका में थे । उनसे मिठाई खरीदने के लिए अपू और दुर्गा के पास पैसे न थे 1 वे मिठाई वाले के पीछे-पीछे मुखर्जी के घर तक जाते हैं । मुखर्जी अमीर आदमी हैं, अत : वे मिठाई जरूर खरीदेंगे । अपू और दुर्गा को उनको मिठाई खरीदते देखकर ही खुशी मिल जाती है ।

फिल्म की शूटिंग कुछ महीनों के लिए रुक गई थी । इसी बीच श्रीनिवास की भूमिका करने वाले सज्जन की मृत्यु हो गई । बाद में उनसे मिलता-जुलता दूसरा आदमी ढूँढ़ा गया । चेहरा तो नहीं मिलता था, पर शरीर से वह उनके जैसा ही लगता था । नया आदमी कैमरे की ओर पीठ करके मुखर्जी के घर के गेट के अंदर आता है, अत : पहचाना नहीं जाता । लोगों को इस अंतर का पता ही नहीं चला ।

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पथेर पांचाली फिल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक क्यों चला?


पथेर पांचाली 'फिल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक इसलिए चला क्योंकि फिल्म बनाते समय कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ा । उस समय लेखक एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी करता था । जब उसे नौकरी के काम से फुर्सत मिलती थी, तभी वह शूटिंग कर पाता था । लगातार शूटिंग कर पाना संभव न था ।

दूसरा कारण था धन का अभाव । लेखक के पास पैसे सीमित थे । जब वे पैसे खत्म हो जाते तब शुटिंग रुक जाती थी । फिर से पैसों का इंतजाम होने पर ही फिल्म की शूटिंग आगे बढ़ पाती थी । इस प्रकार ढाई साल का समय निकल गया ।

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अब अगर हम उस जगह बाकी आधे सीन की शूटिंग करते, तो पहले आधे सीन के साथ उसका मेल कैसे बैठता? उनमें से 'कंन्टिन्यूइटी नदारद हो जाती है-इस कथन के पीछे क्या भाव है?

इस कथन के पीछे यह भाव है कि फिल्म में ककंन्टिन्यूइटीका बहुत महत्व है। एक सीन के दो हिस्से अलग-अलग दिनों में शूट होने पर इसका ध्यान रखना बहुत आवश्यक हो जाता, अन्यथा 'पैच वर्क 'जैसा प्रतीत होता है । दर्शकों को सीन में तारतम्यता चाहिए । उन्हें वास्तविक स्थिति का पता नहीं होता ।

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