व्यक्ति के सुख-दुःख में समाज की क्या भूमिका होती है?

व्यक्ति के सुख-दुःख में समाज नकारात्मक भूमिका अपनाता है। वह व्यक्ति के दुःख को भली-भाँति समझने की बजाय उसे पीड़ा पहुँचाने का काम करता है। वह दुश्मनों जैसा व्यवहार करता है। एक बिलखती हुई स्त्री का दुःख पूछने की बजाय उसे तरह-तरह के व्यंग्य बाणों से घायल किया जाता है। उस पर ताने कसे जाते हैं। उसके साथ अन्याय पूर्ण व्यवहार किया जाता है। ऐसा व्यवहार कोई शत्रु ही कर सकता है। इसलिए हम कह सकते है कि इस संदर्भ में समाज की भूमिका नकारात्मक होती है।
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पड़ोस की दुकानों पर बैठे अथवा बाज़ार में खड़े लोगों को भगवाना की माँ से घृणा क्यों थी।

पड़ोस की दुकानों पर बैठे अथवा बाजार में खड़े लोगों को भगवाना की माँ से इसलिए घृणा हो रही थी क्योंकि लड़के की मृत्यु के अगले ही दिन वह बाजार में खरबूज़े बेचने आ गई थी। उनके अनुसार सूतक के दिनों में घर में रहना चाहिए। जिन लोगों को इसके पुत्र के मरने का पता नहीं। वे यदि इससे खरबूज़े खरीदेंगे तो उनका ईमान-धर्म नष्ट हो जाएगा।
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निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
बुढ़िया खरबूज़े बेचने का साहस करके आई थी, परंतु सिर पर चादर लपेटे, सिर को घुटनों पर टिकाए हुए फफक-फफककर रो रही थी।
कल जिसका बेटा चल बसा, आज वह बाजार में सौदा बेचने चली है, हाय रे पत्थर-दिल!
उस पुत्र-वियोगिनी के दुःख का अंदाजा लगाने के लिए पिछले साल अपने पड़ोस में पुत्र की मृत्यु से दुःखी माता की बात सोचने लगा। वह संभ्रांत महिला पुत्र की मृत्यु के बाद अढ़ाई मास तक पलंग से उठ न सकी थी। उन्हें पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद पुत्र-वियोग से पूछा आ जाती थी और मूर्छा ने आने की अवस्था में आँखों से आँसू न रुक सकते थे। दो-दो डॉक्टर हरदम सिरहाने बैठे रहते थे। हरदम सिर पर बरफ़ रखी जाती थी। शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र-शोक से द्रवित हो उठे थे।
जब मन को सूझ का रास्ता नहीं मिलता तो बेचैनी से कदम तेज हो जाते हैं। उसी हालत में नाक ऊपर उठाए, राह चलतों से ठोकरें खाता मैं चला जा रहा था। सोच रहा था-
शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और.... दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है।
प्रशन:
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखो?
(ख) बुढ़िया को पत्थर दिल क्यों कहा गया है वह क्यों रो रही थी?
(ग) संभ्रात महिला ने पुत्र-शोक में कैसा व्यवहार किया?
(घ) संभ्रात महिला के दुःख को दूर करने के लिए कैसे-कैसे प्रयत्न किए गए?
(ङ) लेखक ने किसके लिए सहूलियत की माँग की हे और क्यों?






(क) पाठ-दुःख का अधिकार, लेखक-यशपाल।
(ख) बुढ़िया की स्थिति से अनजान लोगों ने उसे पत्थर दिल कहा। लोगों को इतना ही पता था कि एक दिन पहले बुढ़िया का जवान बेटा मरा है। और अगले दिन वह खरबूजे बेचने आ गई है। उसे लागों ने कठोर माँ समझा। परन्तु वे उसकी मज़बूरी न समझ सके। बुढ़िया इसलिए रो रही थी क्योंकि उसका जवान बेटा मर गया था।
(ग) संभ्रात महिला पुत्र-शोक से मूर्च्छित हो गई। उसे पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद मूर्छा आ जाती थी। इस प्रकार पुत्र वियोग के कारण उसने ढाई मास पलंग पर बिता दिए।
(घ) संभ्रांत महिला के दुःख को कम करने के लिए अनेक डॉक्टर बुलाए गए। दो-दो डॉक्टर हमेशा उसके सिरहाने बैठे रहते थे। उसके सिर पर हमेशा बर्फ रखी जा रही थी। इस प्रकार उसे प्रयत्न करके सँभाला जा रहा था।
(ङ) लेखक ने समाज के प्रत्येक दुखी व्यक्ति को अपना दुःख मनाने का अवसर देने की माँग की है। इस प्रकार शौक मनाने की सुविधा मिलने से उसके मन पर पड़ा दुःख का भार कम हो जाएगा। जैसे रोने से मन हल्का हो जाता है वैसे ही शोक मनाने से दुःख दूर हो जाता है।

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निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
मनुष्यों की पोशाकें उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती हैं। प्राय: पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्जा निश्चित करती है। वह हमारे लिए अनेक बंद दरवाजे खोल देती है, परंतु कभी ऐसी भी परिस्थिति आ जाती है कि हम ज़रा नीचे झुककर समाज की निचली श्रेणियों को अनुभूति को समझना चाहते हैं। उस समय यह पोशाक ही बंधन और अड़चन बन जाती है। जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं, उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है।
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखो?
(ख) पोशाकें मनुष्य को कैसे बाँटती है?
(ग) पोशाक से मनुष्य के बद दरवाजे किस प्रकार खुलते है?
(घ) पोशाक कब अड़चन बन जाती है?


(क) पाठ-दुःख का अधिकार, लेखक-यशपाल।
(ख) पोशाकें मनुष्य को विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती है। ये पोशाकें ही मनुष्य को उसका अधिकार दिलाती है तथा समाज में उसका दर्जा निश्चित करती है। यदि कोई व्यक्ति अच्छी, महंगी, चमकदार पोशाक पहनता है तो वह अमीर और उच्च वर्ग का माना जाता है। साधारण पोशाक पहनने वाला गरीब व निम्न वर्ग का माना जाता है।
(ग) अच्छी पोशाक पहनने से मनुष्य के बंद दरवाजे खुल जाते है। समाज मे अच्छी पोशाक पहनने वाले को भला आदमी माना जाता है। उसका आदर-सत्कार किया जाता है। किसी दफत्तर आदि में जाता है तो उसकी बात ध्यान से सुनी जाती है।
(घ) जब हम समाज की निम्न श्रेणी के दुःख को देखकर झुकना चाहते है। अर्थात् उसके दुःख का कारण जानना चाहते है तो उच्च भावना के कारण झुक नहीं पाते। उन लोगों के साथ खुलकर बात नहीं कर पाते। तब यह पोशाक हमारे सामने रूकावट बन जाती है।

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निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
जिंदा आदमी नंगा भी रह सकता है, परंतु मुर्दे को नंगा कैसे विदा किया जाए? उसके लिए तो बजाज की दुकान से नया कपड़ा लाना ही होगा, चाहे उसके लिए माँ के हाथों के छन्नी-ककना की क्यों न बिक जाएँ।
भगवाना परलोक चला गया। घर में जो कुछ चूनी-भूसी थी सो उसे विदा करते में चली गई। बाप नहीं रहा तो क्या, लड़के सुबह उठते ही भूख से बिलबिलाने लगे। दादी ने उन्हें खाने के लिए खरबूजे दे दिए लेकिन बहू को क्या देती? बहू का बदन बुखार से तवे की तरह तप रहा था। अब बेटे के बिना बुढ़िया को दुअन्नी-चवन्नी भी कौन उधार देता।
बुढ़िया रोते-रोते और आँखें पोंछते-पोंछते भगवाना के बटोरे हुए खरबूजे डलिया में समेटकर बाज़ार की ओर चली-और चारा भी क्या था?
प्रशन:
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखो।
(ख) लेखक ने समाज की किस कुप्रथा पर व्यंग्य किया है?
(ग) भगवाना की माँ के सामने कौन-सी समस्या आ खड़ी हुई?
(घ) भगवाना की माँ ने बच्चों का पेट भरने का प्रबधं कैसे किया?




(क) पाठ-दुःख का अधिकार, लेखक-यशपाल।
(ख) लेखक ने समाज में शव को नया कफ़न ओढ़ाने की कुप्रथा पर व्यंग्य किया है। ऐसा मनुष्य जो जीते-जी अपने लिए कपड़ो का प्रबंध नहीं कर पाता: उसके मरने पर उसे नया कफन दिया जाता है। कफन जुटाने में चाहे परिवार वालों के छन्नी-ककना ही क्यों न बिक जाए। यह प्रथा वास्तव में गरीबों की विवशता है।
(ग) भगवाना की मृत्यु के बाद उसकी माँ के सामने परिवार का पेट भरने की समस्या आ खड़ी हुई घर में अनाज नहीं था। बहू बुखार से तप रही थी। उसकी दवाई की व्यवस्था करनी थी। उसके अपना छन्नी-ककना बेचकर कफन का कपड़ा खरीदा था। इस प्रकार उस पर एक-के बाद अनेक समस्याएँ आ खड़ी हुई।
(घ) भगवाना की माँ ने बच्चों का पेट भरने के लिए खेत से तोड़े गए खरबूजे उसे खाने को दे दिए। इस प्रकार जैसे-तैसे उनका पेट भर सका।

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