Press "Enter" to skip to content

धर्म और धन : एक परिप्रेक्ष्य

Rahul Kumar 1

आजकल जिधर नज़र घुमाओ, उधर धर्म के ज्ञानी लोग मिल जाते हैं | भले ही किसी ने धर्म के बारे में ज्ञान लिया हो या नहीं, अगर धर्म को लेकर चर्चा हो, तो उसमें टूट पड़ते हैं| वास्तव में अगर देखा जाए तो धर्म की कोई परिभाषा नहीं है| हर इंसान धर्म को अपने अनुसार परिभाषित करता है | कुछ लोगों के लिए धर्म का अर्थ है अपने कार्य और आचरण में सुधार, तो कुछ के लिए देवी देवताओं की अर्चना करना | कुछ लोग मूर्तियों से परे हटकर पारलौकिक शक्तियों या गुरुओं की पूजा करते हैं तो कुछ इन सब से दूर हटकर गरीब और लाचार लोगों की सेवा में जुटे रहते हैं |

आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च समानमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।

धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

इसका अर्थ यह है की – अगर किसी मनुष्य में धार्मिक लक्षण नहीं है और उसकी गतिविधी केवल आहार ग्रहण करने, निंद्रा में, भविष्य के भय में, अथवा संतान उत्पत्ति में लिप्त है, वह पशु के समान है क्योकि धर्म ही मनुष्य और पशु में भेद करता हैं|

धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः ।

धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो, दसकं धर्म लक्षणम ॥

इसका अर्थ यह है की – अगर किसी मनुष्य में धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , शौच ( स्वच्छता ), इन्द्रियों को वश मे रखना , बुद्धि , विद्या , सत्य और क्रोध न करना ; ये दस धर्म के लक्षण है  तो वो धार्मिक मनुष्य है |

धर्म को अंग्रेजी भाषा में रिलिजन कहा जाता है | आज के युग में, लोगों ने इसे अपने स्वार्थ के लिए कई तरह से विभाजित कर दिया है | अब हमारे देश को ही ले लो | भारत में कई तरह के धर्म के लोग विद्यमान हैं | हमारे बीच हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्धिक, जैनी इत्यादि, सब फल फूल रहे हैं | हर धर्म किसी खास समुदाय को परिभाषित करता है | पर क्या आपने कभी यह सोचा है कि इन सब धर्मों कि उत्पत्ति कहाँ से हुई है ?

लीजिए, हम इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं |

महावीर जैन, जो की अंतिम तीर्थक थे एवं जैन धर्म के संस्थापक थे, का जन्म ५४० से ६०० ईसा पूर्व हुआ था | उससे पहले जैन धर्म नहीं था | बौद्ध धर्म के संस्थापक, गौतम बुद्ध,  का जन्म ४०० से ४८३ ईसा पूर्व हुआ था | इससे पहले बौद्ध धर्म भी नहीं था | इस्लाम धर्म के संस्थापक, ५७० ईसाई युग में पैग़म्बर मुहम्मद थे | इससे पहले इस्लाम धर्म भी नहीं था | सिख धर्म की स्थापना १५ वीं शताब्दी में हुई,जिससे पहले सिख धर्म भी नहीं था |

हर धर्म या पंथ का कोई न कोई संस्थापक है जो की एक मनुष्य था | धर्म का होना ज़िन्दगी के लिए महत्वपूर्ण है | यह हमें ताकत और आशा देता है और जीवन की कठिनाइयों में हमारा हौसला बनाए रखता है | परन्तु धर्म के नाम पर मनुष्यों में फूट डालना या धर्मों के आधार पर समाज में बंटवारा होना अनुचित और दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है |

हमारा समाज आज उस पड़ाव पर है जिसमें आम आदमी के आँखों में धुल झोंकना और उसका धन ऐंठ लेना ही मनुष्यों का परम व्यवसाय बन गया है | इसमें हम धर्म को भी खींच लाते हैं और धर्म के आधार पर लोगों को डराते हैं और उन पर अत्याचार भी, करते नहीं सोचते | धर्म के नाम पर आजकल धन कमाने की योजनाएं चलती हैं |

हमारे  देश  में आम तौर पर इंसान  किसी न किसी  धर्म को मानता ही है और हम जब भी किसी मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद या गिरजाघर के साथ जुड़े रहते हैं तो वहां  धर्म के नाम पर अपनी इच्छा या सामर्थ्य से धन  भगवान   को  अर्पित करते है | पर क्या आपने कभी सोचा है कि उस धन का क्या होता है ? हमlरे देश  में छोटे बड़े मिला कर कुल 1,82000 मंदिर है जो की, सरकार द्वारा और खास समुदाय की देख रेख में चलाया  जाता है | हर साल की जो आय इन मंदिरों से जो  आती है वो इस प्रकार है |dhan

अगर हम अनुमान लगाएं  तो २००० करोड़ से ज्यादा की आय इन पांच मंदिर से आती है | ज़रा सोचिये कि बाकी मंदिरों की आय को अगर हम इसमें मिला दें, तो कुल कितनी आय होगी l अगर हम इस आय का ५०% भी गरीब लोगों पर लगा सकें, तो हमारा देश जल्दी ही विकासशील देश से विकसित देश बन सकता है | आम आदमी इन सब से अंजान है और धर्म के नाम पर अपनी महेनत की आमदनी मंदिरों मे दान कर देता है |

चलिए यह तो रहा मंदिरों का बयउरा| क्या आप जानते है मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च की सालाना आय कितनी है?  इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि  इस की सालाना आय की, तो सरकार को भी जानकरी नहीं है तो साधरण इंसान को कैसे होगी |

 

चलिए एक और उदाहरण  से समझने की कोशिश करते है |

पद्मनाभस्वामी मंदिर भारत के केरल राज्य के थिरुवनंथपुरम  में स्थित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। २०११  मे पद्मनाभस्वामी मंदिर से एक लाख करोड़ का खजाना निकला था | उस खजाने का क्या हुआ किसी को कुछ पता ही नहीं, उस वक्त अखबारों में रोज चर्चाएं छपती थीं पर उसकी सही जानकारी कही नहीं है |

मैं आप को इस प्रश्न के साथ छोड़े जा रहा हूँ कि क्या धर्म के नाम पर इस तरह से धन कमाना उचित  है ? अगर इस धर्म की आय का हम कुछ हिस्सा देश के प्रगति में लगा दें तो हमारी और हमारे आने वाली पीढ़ियों का जीवन संवर जायेगा |लाखों लोग आज भी दो वक्त की रोटी जुटाने के चक्कर में मारे-मारे फिरते हैं  | हमारी एक पहल हमारी दशा और दिशा दोनों सही कर सकती है |

धर्म हमें बटंवारा नहीं सिखाता, यह हमको एक होने की शिक्षा देता है | अगर हर कोई इसका अर्थ समझ जाये तो शायद हम इस धर्म और धन से ऊपर उठ कर एक सभ्य समाज का निर्माण कर सके |

  1. Vipul Patel Vipul Patel

    Very true …. n real fact of our country. We have to do some thing to change people mind. So this big amount of money can be used to develop better india.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *