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अहो प्रकृतिसादृश्यं श्लेष्मणो दुर्जनस्य च । मधुरैः कोपमायाति कटुकेनैव शाम्यते ॥

Pankaj Patel 0
अहो प्रकृतिसादृश्यं श्लेष्मणो दुर्जनस्य च ।  मधुरैः कोपमायाति कटुकेनैव शाम्यते ॥

अहो प्रकृतिसादृश्यं श्लेष्मणो दुर्जनस्य च ।
मधुरैः कोपमायाति कटुकेनैव शाम्यते ॥

भावार्थ:

अहो ! कफ़ और एक दुर्जन व्यक्ति की प्रकृति में कितनी समानता है। दोनों मधुरता के अधिक कुपित होते हैं और कटुता से शमित होते हैं।

(इस सुभाषित में एक दुष्ट व्यक्ति की तुलना खांसी के दौरान कंठ में उत्पन्न होने वाले कफ़ से की गयी है। आयुर्वेद में इस का इलाज कषाय द्वारा होता है जो कि अत्यन्त कडुवा होता है। मीठी चीजें खाने से यह बीमारी और बढ जाती है। इसी प्रकार एक दुष्ट व्यक्ति का क्रोध भी मधुर व्यवहार करने से और भी बढ जाता है और जब उस के साथ वैसा ही कटु व्यवहार किया जाता है तभी वह शान्त होता है।)

English

Aho prakrutisaadrashyam shleshmano durjanasya cha.
Madhuraiha kopmayati katukenaiv shamyate.

Oh..! What a similarity is there between the nature of phlegm and a wicked person. Both get aggravated/enraged by sweetness and are subdued or controlled by bitterness.

(In this Subhashita the author has used the simile of a throat infection for a wicked person’s behaviour. Cough is aggravated by consuming sweet things and the taste of medicines for cough is bitter in Ayurveda (Indian system of Medicine). Similarly a wicked person becomes more angry if he is treated courteously but is subdued if he is dealt with by a befitting rude behaviour.)

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