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एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना । दह्यते तद्वनं सर्वं दुष्पुत्रेण कुलं यथा ॥

Pankaj Patel 0
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना । 
दह्यते तद्वनं सर्वं दुष्पुत्रेण कुलं यथा ॥

एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना ।
दह्यते तद्वनं सर्वं दुष्पुत्रेण कुलं यथा ॥

भावार्थ :

किसी वन मे एक सूखा वृक्ष भी आग पकड्ने और फैलने पर संपूर्ण वन को जला कर नष्ट कर देता है, उसी प्रकार जैसे कि एक दुष्ट पुत्र अपने संपूर्ण परिवार और कुल की प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है।

English

Ekena shshkavrukshena dahyamaanena vahninaa
Dahyate tadvanam sarvam dushputrena kulam yathaa.

Even if a single dried up tree in a forest catches fire, it destroys the entire forest by the fire spreading out, just like a bad and unworthy son destroys by his actions and behavior the credibility and fame of a family to which he belongs.

(इससे पहले का सुभाषित – पात्रं न तापयति नैव मलं प्रसूते स्नेहं न संहरति नैव गुणान् क्षिणोति । द्रव्याSवसानसमये चलतां न धत्ते सत्पुत्र एव कुलसद्मनि कॊSपि दीपः ॥ )

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