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लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥१०॥

Rina Gujarati 0
लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।  पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥
Chanakya Nitee 1/10 चाणक्य निती १/१०

लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥१/१०॥

भावार्थ:-

जिस प्रदेश में जीवनयापन के साधन, जनता में निषिद्ध कार्यों को करने पर राज्य द्वारा दण्डित होने का भय, शालीनता, दयालुता तथा त्याग की भावनायें, ये पांच परिस्थितियां नहीं होती हैं वहां कभी भी निवास नहीं करना चाहिये।

(जब हम वर्तमान समय में सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान आदि देशों की परिस्थिति को देखते है या विश्व के अशांतिग्रस्त प्रदेशों के बारे मे सोचते है तो उपर्युक्त सुभाषित की सत्यता प्रमाणित हो जाती है।)

English:

Lokayaatraa  bhayam  lajja  daakshinyam  tyaagasheelataa.
Panch  yatra   na  vidyante  na  kuryaattatra  smsthitim.

In a Country where there is absence of these five virtues.
namely
(i) no proper means of livelihood,
(ii) the citizens having no fear of being punished for their wrong doings, absence of
(iii) modesty,
(iv) kindness and
(v) liberality, one should never stay or live in such a Country.

(The conditions prevailing in Syria, Libia, Afgaanistan etc now a days or think about the disturbed regions of the world, proves the correctness of the above Subhashita.)

इसके पहले का श्लोक – धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसे वसेत ॥९॥ (चाणक्य निती)

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